आज फिर कत्थई झरोखों सेलहलहाता है बारिशी मंज़र
हर तरफ मुस्कुराते पेड़ों ने
लाल पीले लिबास पहने हैं
रोज़ रह-रहके एक समंदर सा...
ऊंघती वादियों पे गिरता है
सब्ज़ पत्तों पे रीझता मौसम...
एक ही राग गुनगुनाता है
ऐलबाती की ठंडी बूंदों में
चन्द यादें टपकती रहती हैं..
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