शुक्रवार, 4 जून 2010

गुब्बारे....

आधी रात को  नींद खुली थी घबराकर 
छूट गयी थी हाथ से गुब्बारे की डोर,
गुब्बारा जो बूढ़े फेरी वाले से,
दर्जन भर आंसू के बदले पाया था...
मुट्ठी में  जो रात को भींच के सोया था..
छूट के हाथों से छत में जा अटका था..
और फिर आधा दर्जन आंसू के बदले
अम्मा ने डंडे से उसे निकला था..
बाँध दिया था फिर खटिया के पाए से,
आधी रात को नींद खुली है घबराकर,
बरसों बाद ये सोच रहा हूँ हाथों से 
छूट गयी है कितने गुब्बारों की डोर,
गुब्बारे जो बूढ़े वक़्त की फेरी से 
आंसू और सांसों के बदले पाए थे...
गुब्बारे सपनों के और उम्मीदों के...



5 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत गहरी और भावपूर्ण रचना.

Dankiya ने कहा…

dhanywad sameer ji..!!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

मन को छू गये आपके भाव।
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रूपसियों सजना संवरना छोड़ दो?
मंत्रो के द्वारा क्या-क्या चीज़ नहीं पैदा की जा सकती?

Shekhar Kumawat ने कहा…

bahut khub



फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

संजय भास्कर ने कहा…

फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई