रविवार, 30 मई 2010

गवई सा चाँद....

बहुत आवारा कहीं बादलों की गलियों में...
तपिश ज़मीं की सर्द करने को,
रात घिरते ही उतर आता है...
देखता है ज़मीं को छिप-छिपकर ,
मेरे मुनगे का वो गवई सा चाँद....

5 टिप्‍पणियां:

Amitraghat ने कहा…

"बेहतरीन..."

Jandunia ने कहा…

काबिल-ए-तारीफ

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन ख्याल!!

Dankiya ने कहा…

dhanyawad..sabhi ko !!

rashmi ने कहा…

bahut sundar.