बुधवार, 19 मई 2010

मेरे ख्यालों की फ़्रोक पहने
तुम अरगनी से सुखाये कपडे उठा रही  हो 
मैं दूर फाटक की ओट लेकर
तुम्हें निगाहों से छू रहा हूँ
थके हुए साये शाम के सब
दरी पे आकर पसर गए हैं
तुन्हें ये शायद पता नहीं है...
मैं कितनी सदियों से सूने आँगन
की धूप ओढ़े खड़ा हुआ हूँ
मेरे ख्यालों की फ़्रोक पहने
तुम अरगनी से सुखाये कपडे उठा रही हो...

3 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

waah naayab shabd chune aur aankhon se chhoone waali baat jam gayi...

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!

rashmi ने कहा…

bahut achha..!!